Monday, November 2, 2009

इ भाई-दूज...

इ भाई-दूज
दीपावली के त्यौहार पर अब वो उल्लास नजर नहीं आता .लोग मनाते है पर एकाकी से .
कहीं कहीं परिवारों ,मोहल्लो में सामूहिक दिपावली मिलन होते हैं परंतु वे सब साथ रहकर भी अलग अलग
से प्रतीत होते हैं डी.बड़ों को धोक देना भी महज एक औपचारिकता सी रह गई है .
जाने-अनजाने संबंधों में पनपी छेटीयां धीरे धीरे दरारों में परिवर्तित हो रही है .
समय बदल रहा है .व्यस्तताएं बढ़ रही है .संबंधों की मिठास पर भी शायद महंगाई का
ग्रहण लग गया है और इस बार मन के भावो में भी मंदी का असर कुछ ज्यादा ही
नजर आया .बहनों के sms मिले भाई-दूज पर .उनका नेक कुरियर से रवाना किया .
मोबाईल on किया ,सर पर दो बार घुमा कर आरती उतारी ,गली के हलवाई की बेस्वाद
मिठाई मुह में डाली और मनाली इ भाई -दूज

.आस्तिकता ....

नास्तिक तो मैं बिलकुल नहीं ,बल्कि परम आस्तिक हूँ . हाँ ! दिखावा जरूर पसंद नहीं .
आजकल परिवार वाले ,मित्र सभी हंसते हैं ,की मैंने भगवान् को कभी अगरबत्ती नहीं लगाईं
परन्तु शाम होते ही रोज नियम से मच्छरों के लिए अगरबत्ती जरूर लगा देता हूँ .
शायद पुरे प्रदेश में फैले हुए मलेरिया तथा डेंगू के दर से .
सोचता हूँ कण कण मे भगवान ! आखिर मच्छरों में भी तो वे ही बसते हैं