अभी -अभी सावन का महिना गया . मुझे एक पुराने फिल्मी गीत पर नया मुखडा सुझ रहा है ,
भादो का महिना भजन करे शोर ........
गणेश जी के आराधना पर्व के साथ ही शहर में ध्वनि प्रदुषण बढ़ गया है .अब यह सिलसिला चलता ही रहेगा . गरबों की तैयारियां भी शुरू होने को है .गणेशोत्सव जिस उद्देश्य को लेकर इतिहास पुरुष लो. तिलक ने शुरू किया था वह तो कब का बीत चूका .अब तो यह छुटपुट नेताओं ,कार्यकर्ताओं तथा फुरसती लोगों का अखाडा मात्र बन चूका है .हरेक चौराहे पर गणेश प्रतिमा पांडाल , भीड़ लगाकर ट्राफिक जाम करते लोग , और कान फोडू असंगत भजन संध्याएँ ,उस पर दिन रात बजते भोपूं . अभी एक भजन बज रहा था ,शायद शिवजी कह रहे थे .. नहीं चाहिए मिश्री मलाई ओ गणेश की मम्मी मुझे पाव भर भांग पिला दो ना...........
सोचता हूँ ! ये कहाँ आ गए हम साथ चलते चलते ... भगवान को भजनो से रिझाना तो दूर, शायद शोर सुनकर भगवान् मंदिरों से कहीं दूर भाग जाते होंगे . कई बार लगता है की अच्छा ही है अधिकतर त्यौहार चातुर्मास में आते हैं.तब देव गहरी नींद में सो गए होतें हैं .परन्तु हम मानवों का क्या जिनकी रातों की नींदें हराम हो रही है. जाने अनजाने में ध्वनि प्रदुषण से उत्पन्न तनाव हमारी जिंदगी को प्रभावित करता है . शायद इंदौर शहर की नियति यही है .धूल और धूएँ के गुबारों के बीचभजन सुनते -सुनते ही हमें अपने मन को प्रभू में तल्लीन करना सीखना होगा.


अच्छा लिखा है। विचार अच्छे है अब इस ब्लाग को विषय आधारित बनाने की जरुरत है।
ReplyDeleteअनुराग तागड़े
दाते साहब हम तो आपकी बांसुरी के फैन हैं
ReplyDeleteसंजय पटेल जी ने एक बार आपकी बांसुरी से परिचय कराया था
आज आप ब्लाग की दुनियां में आये, बहुत अच्छा लगा
दाते साहब आप बहुत हद तक सही है। राजनीति और धर्म बेमेल है। लेकिन सच बताऊं तो दिल्ली आकर इंदौर के उत्सवों के इस रंग को बहुत मिस करता हूं।
ReplyDeleteआपका ब्लॉग जगत में आने पर स्वागत है... ब्लॉग्गिंग आपके विचारों को जरिया प्रदान करती है... हम पहले बहुत कम संख्या में थे अब धीरे-धीरे बढ़ रहे हैं... ख़ुशी की बात है....
ReplyDeleteफिर से आपका स्वागत...
विचारणीय प्रश्न ..!!
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