हम सब जानते हैं की हमारे देश भारत का नाम प्राचीन काल के एक महा पराक्रमी राजा भरत के नाम से ही ' भारत ' कहलाया
लेकिन पिछली कई शताब्दियों से हमारे नैतिक मूल्यों में लगातार गिरावट आ रही है.इन दिनों लगने लगा है की भारत शब्द के मायने बदल रहे हैं .भ - रत याने भ्रष्टाचार में रत .
यह भारत शब्द का असली रूप नहीं है.पहले के राजा अपनी वीरता और साहस के बल पर दुश्मनों के किले जीतकर चक्रवर्ती कहलाते थे ,आज हम दुसरों की जेबें काटकर अपने लिये बड़े -बड़े किले नुमा घर बनाने में लगे है.
भ्रष्टाचार तथा रिश्वतखोरी से कौन कितना माल अपने किले में जमा करता है यही पराक्रम की परिभाषा बन गई है.
यह दुसरे का माल हड़पने का क्रम [पराक्रम ] यूहीं चलता रहा तो भारत को पतन की राह से रोकना कितना मुश्किल होगा.
जाहीर है इसके लिए नया खून,नई उमंगें, नई जवानी चाहिए
देश का युवा ताकतवर, सहनशील, और संवेदनशील होना चाहिए.युवा की वायु जैसी ताकत और प्रसार शक्ति से हमें मजबूत भारत खडा करना है. इसके लिए एकजुट होने की जरूरत है. क्यों न खुद से ही और आज से ही शुरू करें ?


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